Monday, February 8, 2016

भूमिशुध्दि.... शल्य चक्र





गृहस्वामी से अपने इष्टदेव का स्मरण करके शल्य (अनिष्ट पदार्थ) के विषय में शिल्पी से उसके देव,वृक्ष,फल का नाम पूछना  चाहिए । उस के बोले हुए अक्षर को ध्यान में रख कर बुद्धिपूर्वक उत्तर देना चहिये।
१. प्रश्न  में "ब" आये तो वास्तु भूमि के पूर्व भाग में १.५ हस्त नीचे  मनुष्य का शल्य होता है।
    फल- गृहस्वामी तथा प्रसाद निर्माण करनेवाले की मृत्यु होती है।
२.  प्रश्न  में "क " आये तो वास्तु भूमि के अग्निकोणे  में २ हस्त निचे गधे का शल्य होता है ।
     फल- राजदंड का भय और अन्य भय रहते है ।
३. प्रश्न  में "च " आये तो वास्तु भूमि के दक्षिण भाग में कमर तक निचे पुरुष का शल्य होता है।
    फल- गृहस्वामी का मृत्यु
४. प्रश्न  में "त " आये तो वास्तु भूमि के नैऋत्य कोने में १. ५ हस्त निचे गधे का शल्य होता है।
    फल-बच्चो के लिए अशुभ है।
५. प्रश्न  में "अ " आये तो वास्तु भूमि के पश्चिम भाग में १.५ हस्त निम्न बालक का शल्य मिलता है।
    फल-गृहस्वामी नित्य प्रवासी रहता है।
६. प्रश्न  में "ह " आये तो वास्तु भूमि के वायव्य कोने में ४ हस्त निचे कोयला और छिलके मिलते है।
     फल-यहाँ बुरे स्वप्न एवं मित्रो का नाश होता है।
७. प्रश्न  में "स" आये तो वास्तु भूमि के उत्तर भाग में कमर तक निचे खुदाई करने पर ब्राह्मण शल्य मिलता है।
    फल-गृहस्वामी निर्धन होता है।
८. प्रश्न  में "व् " आये तो वास्तु भूमि ईशान कोने में १. ५ हस्त निचे गाय का शल्य मिलता है\
   फल-पशुधन का नाश होता है।
९. प्रश्न  में "य " आये तो वास्तु भूमि के मध्य भाग में रदय तक खुदाई  पर मस्तिष्क् की शल्य मिलती है।
     फल- गृहस्वामी के कुल का नाश होता है।
   

Thursday, June 19, 2014

आय के आठ प्रकार


कभी कभी कई स्थान पर  हमें शांति  का अनुभव होता है वह स्थान  एक सामान्य घर होता है। और कई स्थान पर  सब प्रकार की सुविधा होने पर भी शांति का अहसास नहीं होता। नई जगह रहने से  किसी का भाग्योदय होता है तो   किसी को हानि होती है।
इस लिए नये स्थान पर जाने से पूर्व उस स्थान की ऊर्जा का निर्णय करना चाहिए. ।
कभी कभी एक छोटा सा परिवर्तन भी भाग्योदय करने के लिए सहायक हो सकता है.

घर और घरमालिक  की कुंडली का मेलापक करना चाहिए  है. प्रत्येक घर का आय ,व्यय ,राशि,नक्षत्र ,लग्न ,तारा आदि  निर्णय करना चाहिए। घर का क्षेत्रफल तथा घर मालिक का हस्तगत प्रमाण के आधार से लेनदेन का निर्णय किया जाता है.
.
आय के आठ प्रकार के होते हैं.

1. ध्वज आय  - प्रसिद्धि
2 धूम आय -. शोक
3.सिंह  आय  - जय
४ श्वान  आय -. शत्रु भय
५ . वृष  आय -  धन प्राप्ति
६. खर आय - दरिद्रता
७  गज आय  -सुख प्राप्ति
8 उष्ट्र  आय -. रोग भय
हमेशा आय व्यय से ज्यादा होनी चाहिए. आय से  मुख्य दरवाजे की दिशा  निर्धारित कर  सकते  है. आय व्यय से ज्यादा हो तो  जीवन के अधिक आर्थिक उन्नति होती है .
गृह की कुंडली का निर्माण करने के लिए सही व्यक्ति का मार्गदर्शन ले।

पूर्व में वास्तुकला - प्रवाह में उत्तर Positiva ऊर्जा पूजा कक्ष, एक अध्ययन कक्ष, पानी की टंकी, वास्तुकला अधिक शुभ हो जाता अग्रणी की दिशा में है.
पश्चिम -. दक्षिण एक अच्छा फल प्राप्त करने की शुरुआत कर रहे हैं एक बिस्तर, सीढ़ी, स्टोर रूम के लिए नकारात्मक ऊर्जा कक्ष के प्रवाह में है.
स्थान निर्धारित करने के लिए नक्शे के केंद्र में सभा के लिए सबसे पहले घर की ऊर्जा तो उत्तर द्वारा निर्मित कम्पास -. दक्षिण लाइन और ईस्ट - ऊर्जा दृढ़ संकल्प की वास्तुकला में वेस्ट लाइन निशान बनाया जा सकता है.
 जगह की वास्तुकला की ऊर्जा निर्धारित किया जा सकता है.
घर - कुछ प्रयोग होने की Positiva (सकारात्मक) ऊर्जा काम करने के लिए.
* संघर्ष से घर - खुद करने की आवश्यकता को कम करने के लिए एक नियमित आधार पर uccata नमक.
शौचालय में हैं -. बाथरूम में negativa ऊर्जा * क्योंकि Samundari नमक और बाथरूम में डाल परिवर्तित किया जाना चाहिए.
* क्योंकि कम ऊर्जा के घर रखने के लिए रात में कपड़े बाहर सूख Positiva. घर की Phangsui purusavarga है और आर्थिक मामलों में अधिक काम करते हैं.
* लक्ष्मी vasali स्थापित करने के लिए घर के मुख्य गेट खुश है.
* पूर्व में तुलसी के पौधे - उत्तर - पूर्व दिशा में होना चाहिए, अधिक बगीचे से सांप के साथ ध्यान में रखते हुए dhanagamana भी हैं.
* Mukhyadvara पर svatika नामांकन की बुराई तत्व से और साथ ही हस्ताक्षर करने की कोशिश नहीं करता.

भाग्योदय devikrpa से, कड़ी मेहनत से, पृथ्वी से, आप आसपास के वातावरण में परिवर्तन. गीता में कहा है बनाने के लिए है अर्थ ...
 "अधिष्ठानं तथा कर्ता करणं च पृथग्विधम्.
   विविधाकश्च पृथक्चेष्टा दैवं चैवात्र पचमम् .. "
 .

Tuesday, January 14, 2014

Agni disha ka mahatva


कभी कभी कई स्थान पर  हमें शांति  का अनुभव होता है वह स्थान  एक सामान्य घर होता है। और कई स्थान पर  सब प्रकार की सुविधा होने पर भी शांति का अहसास नहीं होता। नई जगह रहने से  किसी का भाग्योदय होता है तो   किसी को हानि होती है।
इस लिए नये स्थान पर जाने से पूर्व उस स्थान की ऊर्जा का निर्णय करना चाहिए. ।
कभी कभी एक छोटा सा परिवर्तन भी भाग्योदय करने के लिए सहायक हो सकता है.

घर और घरमालिक  की कुंडली का मेलापक करना चाहिए  है. प्रत्येक घर का आय ,व्यय ,राशि,नक्षत्र ,लग्न ,तारा आदि  निर्णय करना चाहिए। घर का क्षेत्रफल तथा घर मालिक का हस्तगत प्रमाण के आधार से लेनदेन का निर्णय किया जाता है.
.
आय के आठ प्रकार के होते हैं.

1. ध्वज आय  - प्रसिद्धि
2 धूम आय -. शोक
3.सिंह  आय  - जय
४ श्वान  आय -. शत्रु भय
५ . वृष  आय -  धन प्राप्ति
६. खर आय - दरिद्रता
७  गज आय  -सुख प्राप्ति
8 उष्ट्र  आय -. रोग भय
हमेशा आय व्यय से ज्यादा होनी चाहिए. आय से  मुख्य दरवाजे की दिशा  निर्धारित कर  सकते  है. आय व्यय से ज्यादा हो तो  जीवन के अधिक आर्थिक उन्नति होती है .
गृह की कुंडली का निर्माण करने के लिए सही व्यक्ति का मार्गदर्शन ले।

पूर्व में वास्तुकला - प्रवाह में उत्तर Positiva ऊर्जा पूजा कक्ष, एक अध्ययन कक्ष, पानी की टंकी, वास्तुकला अधिक शुभ हो जाता अग्रणी की दिशा में है.
पश्चिम -. दक्षिण एक अच्छा फल प्राप्त करने की शुरुआत कर रहे हैं एक बिस्तर, सीढ़ी, स्टोर रूम के लिए नकारात्मक ऊर्जा कक्ष के प्रवाह में है.
स्थान निर्धारित करने के लिए नक्शे के केंद्र में सभा के लिए सबसे पहले घर की ऊर्जा तो उत्तर द्वारा निर्मित कम्पास -. दक्षिण लाइन और ईस्ट - ऊर्जा दृढ़ संकल्प की वास्तुकला में वेस्ट लाइन निशान बनाया जा सकता है.
 जगह की वास्तुकला की ऊर्जा निर्धारित किया जा सकता है.
घर - कुछ प्रयोग होने की Positiva (सकारात्मक) ऊर्जा काम करने के लिए.
* संघर्ष से घर - खुद करने की आवश्यकता को कम करने के लिए एक नियमित आधार पर uccata नमक.
शौचालय में हैं -. बाथरूम में negativa ऊर्जा * क्योंकि Samundari नमक और बाथरूम में डाल परिवर्तित किया जाना चाहिए.
* क्योंकि कम ऊर्जा के घर रखने के लिए रात में कपड़े बाहर सूख Positiva. घर की Phangsui purusavarga है और आर्थिक मामलों में अधिक काम करते हैं.
* लक्ष्मी vasali स्थापित करने के लिए घर के मुख्य गेट खुश है.
* पूर्व में तुलसी के पौधे - उत्तर - पूर्व दिशा में होना चाहिए, अधिक बगीचे से सांप के साथ ध्यान में रखते हुए dhanagamana भी हैं.
* Mukhyadvara पर svatika नामांकन की बुराई तत्व से और साथ ही हस्ताक्षर करने की कोशिश नहीं करता.

भाग्योदय devikrpa से, कड़ी मेहनत से, पृथ्वी से, आप आसपास के वातावरण में परिवर्तन. गीता में कहा है बनाने के लिए है अर्थ ...
 "अधिष्ठानं तथा कर्ता करणं च पृथग्विधम्.
   विविधाकश्च पृथक्चेष्टा दैवं चैवात्र पचमम् .. "
 .

Monday, January 13, 2014

Ishan disha..........vastu shastra se

आज ईशान कोण  के बारे में जानेगे। … इशान कोण पूर्व ओर  उत्तर  के  
 बिच  का कोण। .... इशान  दिशा का स्वामी है रूद्र आयुध,त्रिशूल। …गुरु ग्रह  का प्रभाव भी विशेष देखने को मिलता है।  कुंडली में दूसरे और तीसरे स्थान का निरूपण भी ईशान कोण से देखा जा सकता है ,
अर्थात यह कोण पवित्र है अत: या दिशा सर्वदा स्वच्छ  रखनी चाहिए। 

*इस दिशा में मोटा हॉल अथवा गैलरी हो तो शुभ कहते है। किन्तु टॉयलेट इस दिशा में कुल नाश करता है।        
 संतान  का प्रस्न एवं  गृह क्लेश रहता है। 
*यदि यह दिशा कम होती है तो संतान कि प्राप्ति होती नहीं या फिर संतान विकलांग या अल्पायु होता है। 
*ईशान दिशा निचा  हो तो स्वामी को सुख -सम्पति एवं धनलाभ होता है। 
*मगर ईशान दिशा वास्तु दोष हो या नैऋत्य कोण निचा हो तो हेल्थ एवं चारित्र्य  के प्रश्न  होते है। 
*अंडर ग्राउंड टैंक ,tube वेल ,कुँवा  ईशान कोण में होने से आर्थिक सम्पति  बढता है। किन्तु यहाँ पानी का रोटेशन होना भी जरुरी है। 
*कुँवा  सदा गोलाकार होना चाहिए। 
*ईशान कोण देवस्थान के लिए उत्तम है। पूजा में बेठे हुए व्यक्ति का चेहरा पूर्व की ओर  होना चाहिए।
*ऑफिस में ईशान में प्रवेश ,देव कि मूर्ति,वाटरकूलर ,मंदिर,विजिटिंग रूम,खुली जगह  रखना  शुभ  होता  है। 
*ईशान कोण सदा शुद्ध एवं पवित्र रखना चाहिए। 

*दोष निवारण के लिए नियोन कि लाइट लगा सकते है। शिवा महिम्न स्तोत्र एवं सोमवार का व्रत शुभत्व देता है। 
*घर के मुख्य दरवाजे पर त्रिशूल,ॐ ,स्वस्तिक  लगाने से गृह स्वामी के अधूरे कार्य पूर्ण हो जाते है। 
*प्रात: मुख्य दरवाजे के आगे एक गिलास पानी डालने से गृह में सपन्नता एवं शांति बनी रहती है। 



Thursday, December 12, 2013

vastu aevam panch tatva ....

समग्र प्रकृति पञ्च तत्व पर निर्भर है (फाइव एलिमेंट )अग्नि ,भूमि,वायु,जल,आकाश
      अग्नि तत्व जो वास्तु में अग्नि कोण में अधिपत्य है , पूर्व दिशा के सब से अधिक सूर्य कि किरणे अग्निकोण में आती है,इशी लिए अग्निकोण में रसोईघर रखने कि सलाह वास्तुशास्त्री देते है। जिस कारण अग्निकोण में पकाई गयी रसोई कुटुंब को स्वस्थ बनती है। दूसरी बात यह शुक्र  का अधिपत्य पर है मतलब जिस घर में अग्निकोण में रसोईघर हो उस घर कि आर्ट स्त्री सुखी होती है ,उस घर में खाना पीना ,गुमना वस्त्र -सोन्दर्य प्रसाधन अधिक देखेने को मिलते है। अगर रसोई घर नहीं है तो अग्निकोण को बलवान करने के लिए वह लाल बल्ब या इलेक्ट्रिक डेकोरेटिव आइटम रखवाते है। तभी तो इस कोण में पानी होना अशुभ फल देता है। 
पानी टैंक कुवा स्विमिंग पुल इत्यादि व्यर्ज़ है। 
       भूमि तत्त्व  जो  वास्तु में नैऋत्य कोण से देखते है। तभी तो इस कोण को हमेशा भारी रखने कि सलाह देते है। भूमि तत्त्व में गंध का विशेष गुण होता है। फुंगसुई में tai chai  देखि जाती है। पारस्परिक सम्बन्ध का सूचक रहता है मतलब जिस घर में नैऋत्य कोण अच्छा नहीं है वहा लग्नजीवन -संतान के सम्बंधित प्रश्र्न  रहते है। जिस कारण वास्तुशास्त्री नैऋत्य कोण को ऊँचा एवं भारी बनाते है। 
बागवा के अनुसार घर में प्लांट रखने कि सलाह देते है। 
       वायु तत्व  जिस के शब्द -स्पर्श गुण है।  सपरश से संवेदना होती है -चेतना होती है। वास्तु में  उतर -वायव्य कोण में वायु तत्व अधिपत्य रखते है। तभी तो इस कोण में अधिक बारी या वेंटिलेशन रखने चाहिए। बागवा के अनुसार विंडब्ल् या छोटी घंटी लगायी जाती है। इस कोण में रखे हुए इलेक्ट्रिक साधन अधिक मात्र में बिगड़ जाते है। अघर वायु तत्व डिस्टरब है तो मानसिक त्रास ,परदेश जाना ,सवेंदनशीलता में परिवर्तन होते रहते है। अस्थमा ,हाई ब्लूड प्रेशर ,हार्ट प्रॉब्लम कि तकलीफ रहती है। 
        जल तत्व  वास्तु में ईशान कोण में आता है। सामान्य नियम अनुसार नैऋत्य के पवन बारिश लेट है।  बारिश का पानी -पवन दक्षिण -पश्विम में ज्यादा होते है। तभी तो नैऋत्य कोण को ऊंचा और ईशान कोण को निचा रखा जाता है। इसी लिए यहाँ पानी कि  अंडरग्राउंड टैंक ,पानी का बोर,कुवा इत्यादि रखना शुभ कहा गया है। फैंग सुई में यहाँ फिश घर -फाउंटेन रखने का कहते है।  
         आकाश तत्व  वास्तु में ब्रह्म स्थान होता है। इशी लिए पुराने समय में घरे के मध्य में खुली जगह रखते थे। जो आकाश का दर्शन कराती थी। अब ये सम्भव नहीं  है तो माकन कि छत तो ऊंची रखना जरुरी है। आप देखिये जिस घर में छत ऊंची होगी वहा  प्रवेश करते ही शांति का एह्सास  होता है। विचारो में उदारता दिखाई देती है।  आकाश तत्त्व का सम्बन्ध ध्वनि से है इसी लिए पिलर आदि  के  उपाय में दो बंसी को क्रॉस में छत में लगाने के लिए कहते है। 

अगर वास्तु में पञ्च तत्व डिस्टरब हो जाये तो पुरे परिवार का जीवन अस्त व्यस्त हो जाता है।  इसी तरह हमारे शारीर में पञ्च तत्व डिस्टर्ब हो तो हमारा जीवन बिगड़ जाता है। 
इस पर अधिक से अधिक विचार करने पर हमें वास्तु के सारे उपाय मिल सकते है।


Saturday, February 2, 2013

वास्तुपुरुष परिचय

वास्तुशास्त्र में वास्तुपुरुष का सम्बन्ध निर्माणकार्य में वास्तुपुरुष कप्रत्येक अंग से सुभाशुभ  फल का विचार किया जाता है।
वास्तुपुरुष  के अंग अवं उस पर अधिपति देव का विवरण .....
वास्तुपुरुष के अंग .........अधिपति देव ......
मस्तक ...........महादेव
कण ..................पर्जन्य & दिति
गला .......................आयदेव
कन्धा .................जय & अदिति
स्तन .......................आर्यमा & पृथ्वीधर 
रुदय                            आपवत्स
बाया बाहु ....................इन्द्रादि
दाया बाहु .....................नागादि
बाया हस्त ..........सावित्री & सविता
दाया हस्त ........रूद्र & रुद्रदाक्ष
नाभि .............ब्रह्मा
इन्द्रियस्थान ...........इंद्रा & जय



 

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Friday, December 28, 2012

SARAL VASTU

आजकल वास्तु में रस बढ़ता जाता है ! हर एक को अपना घर वास्तु के हिसाब से करना है ! तो सरल क्या है ?
इस चित्र में घरमे कौनसे देवता रहते है यह बताया गया है !! अर्थात सब के घर में यह देव तो होते ही है ! बस इसका लाभ उठाना है और घर में सुख पाना है !! यही तो कोशिश है हमारी !!